بين زخات المطر ,,
المتساقطه على وجنتيه ,,
هناك ,, في سحر عينيه ,,
تذوب كل مشاعري ,,
يحادثني ,,
بلغه لا يفهمها ,,
غيري انا! ,,
تنطق احرفه ,,
بحروف ,,
تتغزل بخلاياي ,,
فتحمر! ,,
كم اعشق غزله هذا ,,
هو يوسفي ,,
نعم ,,
يوسفي آنا
وفقط...
اطلقت شعري ,,
وجعلته يطير بين نسمات الهواء ,,
على شرفتي اقف ,,
والبحر امامي ,,
والمطر ,,
يغسلني! ,,
ياتيني مقتربا ,,
مبعدا كل ما يعيق نظراته الي ,,
باصبعيه ,,
يحرك خصلات شعري ,,
وكانه يعلن ثوره ,,
لكل من يقف في طريق نظراته ,, نحوي! ,,
يقترب ,,
شيئا فشيئآ ,,
كعادته ,,
يحب مداعبتي! ,,
بل يعشقها! ,
يهمس باذني ,,
كلمات عشق ,, تجعلني اذووب في عشقه ,,
" حبيبتي ,, كم اعشق خديك حينما تتوردان خجلا "
ويبتسم ,,
ثم يتعبد
يااااه ,,
هو يعلم ,
نعم يعلم ,,
انني لن اتركه ,,
حركاته تاسرني ,,
كلماته تذيبني ,,
وهو يدرك ,,
حق ادراك ,,
كيف يقودني اليه ,, بكل اريحيه! ,,
تم التعديل من قبل إدارة القسم



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